(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

आश्वमेधिकपर्व


॥ श्रीः ॥
14.76. अध्यायः 076
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Topics
अर्जुनेन भगदत्तात्मजपराजयः॥ 1 ॥
Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Text

एवं त्रिरात्रमभवत्तद्युद्धं भरतर्षभ।
अर्जुनस्य नरेन्द्रेण वृत्रेणेव शतक्रतोः॥ 14-76-1(94580)
ततश्चतुर्थे दिवसे यज्ञदत्तो महाबलः।
जहास सस्वनं हासं वाक्यं चेदमताब्रवीत्॥ 14-76-2(94581)
अर्जुनार्जुन तिष्ठस्व न मे जीवन्विमोक्ष्यसे।
त्वां निहत्य करिष्यामि पितुस्तोयं यथाविधि॥ 14-76-3(94582)
त्वया वृद्धो मम पिता भगदत्तः पितुः सखा।
हतो वृद्धोऽपि बाधित्वा शिशुं मामद्य योधय॥ 14-76-4(94583)
इत्येवमुक्त्वा संक्रुद्धो यज्ञदत्तो नराधिपः।
प्रेषयामास कौरव्य वारणं पाण्डवं प्रति॥ 14-76-5(94584)
सम्प्रेष्यमाणो नागेन्द्रो यज्ञदत्तेन धीमता।
उत्पतिष्यन्निवाकाशमभिदुद्राव पाण्डवम्॥ 14-76-6(94585)
अग्रहस्तसुमुक्तेन शीकरेण स नागराट्।
समौक्षति गुडाकेशं शैलं नील इवाम्बुदः॥ 14-76-7(94586)
स तेन प्रेषितो राज्ञा मेघवद्विनदन्मुहुः।
मुखाडम्बरसंह्रादैरभ्यद्रवत फल्गुनम्॥ 14-76-8(94587)
स नृत्यन्निव नागेन्द्रो यज्ञदत्तप्रचोदितः।
आससाद द्रुतं राजन्कौरवाणां महारथम्॥ 14-76-9(94588)
तमायान्तमथालक्ष्य यज्ञदत्तस्य वारणम्।
गाण्डीवमाश्रित्य बली न व्यकम्पत शत्रुहा॥ 14-76-10(94589)
चुक्रोध बलवच्चापि पाण्डवस्तस्य भूपतेः।
कार्यविघ्नमनुस्मृत्यि पूर्ववैरं च भारत॥ 14-76-11(94590)
ततस्तं वारणं क्रुद्धः शरजालेन पाण्डवः।
निवारयामास तदा वेलेव मकरालयम्॥ 14-76-12(94591)
स नागप्रवरः श्रीमानर्जुनेन निवारितः।
तस्थौ शरैर्विनुन्नाङ्गः श्वाविच्छललितो यथा॥ 14-76-13(94592)
निवारितं गजं दृष्ट्वा भगदत्तसुतो नृपः।
उत्ससर्ज शितान्बाणानर्जुने क्रोधमूर्छितः॥ 14-76-14(94593)
अर्जुनस्तु महाबाहुः शरैररिनिघातिभिः।
वारयामास तान्बाणांस्तदद्भुतमिवाभवत्॥ 14-76-15(94594)
ततः पुनरभिक्रुद्धो राजा प्राग्ज्योतिषाधिपः।
प्रेषयामास नागेन्द्रं बलवत्पर्वतोपमम्॥ 14-76-16(94595)
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य बलवान्पाकशासनिः।
नाराचमग्निसङ्काशं प्राहिणोद्वारणं प्रति॥ 14-76-17(94596)
स तेन वारणो राजन्मर्मस्वभिहतो भृशम्।
पपात सहसा भूमौ वज्ररुग्ण इवाचलः॥ 14-76-18(94597)
स पतञ्शुशुभे नागो धनंजयशराहतः।
विशन्निव महाशैलो महीं वज्रप्रपीडितः॥ 14-76-19(94598)
तस्मिन्निपतिते नागे यज्ञदत्तस्य पाण्डवः।
तं न भेतव्यमित्याह ततो भूमिगतं नृपम्॥ 14-76-20(94599)
अब्रवीद्धि महातेजाः प्रस्थितं मां युधिष्ठिरः।
राजानस्ते न हन्तव्या धनंजय कथञ्चन॥ 14-76-21(94600)
सर्वमेतन्नरव्याघ्र भवत्येतावता कृतम्।
योधाश्चापि न हन्तव्या धनंजय रणे त्वया॥ 14-76-22(94601)
वक्तव्याश्चापि राजानः सर्वे सह सुहृज्जनैः।
युधिष्ठिरस्याश्वमेधो भवद्भिरनुभूयताम्॥ 14-76-23(94602)
इति भ्रातृवचः श्रुत्वा न हन्मि त्वां नराधिप।
उत्तिष्ठ न भयं तेऽस्ति स्वस्तिमान्गच्छ पार्थिव॥ 14-76-24(94603)
आगच्छेथा महाराज परां चैत्रीमुपस्थिताम्।
तदाऽश्वमेधो भविता धर्मिराजस्य धीमतः॥ 14-76-25(94604)
एवमुक्तः स राजा तु भगदत्तात्मजस्तदा।
तथेत्वेवाब्रवीद्वाक्यं पाण्डवेनाभिनिर्जितः॥ ॥ 14-76-26(94605)

इति श्रीमन्महाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अनुगीतापर्वणि षट्सप्ततितमोऽध्यायः॥ 76 ॥

Mahabharata - Ashvamedhika Parva - Chapter Footnotes
7-76-13 शललितः शलाकाप्रोतः॥


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